पहली बारिश……. 📝

आज फिर बादल गरजा है, कैसे कहूँ किस किस

का मन फिर तरसा है।

बादल को क्या कहूँ वो तो गरजता है , मगर साथ साथ एक कवि का मन भी दहकता है।

मन को क्या कहूँ वो तो बहकता है ,मगर इस बार वो भी बारिश को तरसा है।

गरज गरज कर जब वो बरसता है ,कवि का मन फिर कविता लिखने को बहकता है।

सालों से कविता छोड़ चुका कवि भी ,देख बारिश अपनी नई कविता फिर गड़ता है।

जेसे बारिश की बूँदे ज़मीन पर बरसती हैं, कवि के शब्द पन्नों पर बिखरते है।

जेसे बारिश का असर ज़मीन पर दिखता है, वेसे ही मौसम का असर कवि की कविता मैं झलकता है।

पहली बारिश का शोर भी फिर संगीत सा उसके कानों में घुलता है

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